आवाज़ या अपराध ?


 



कभी थे सवाल, अब हैं सज़ा,

कभी थी बहस, अब है खता।

जो बोले सच, वो गुनहगार,

जो चुप रहे, वो समझदार।


जो पूछे "क्यों?", वो शत्रु बन जाए,

जो झुके, वो ही देशभक्त कहलाए।

क्या इतना डर है मतभेद से?

क्या डर गए हो अब फ़क़्त खेद से?


कल जो किताबों में सीखा था,

"लोकतंत्र" कह के लिखा था,

आज उसी किताब पे धूल है,

हर पन्ने पे अब बंदूकें फूल हैं।


ना राष्ट्र विरोध है ना आगजनी,

बस कुछ सवाल हैं  "क्यों महंगाई इतनी ?"

क्यों किसान सड़कों पर रोते हैं?

क्यों बच्चे भूख से सोते हैं?


क्यों हक़ माँगना गुनाह बन गया?

क्यों विरोध "विद्रोह" बन गया?

क्या देशभक्ति बस नारा है?

या फिर ये सत्ता का इशारा है?


मैं पूछूँ — तो देशद्रोही ?

मैं चुप रहूँ — तो "देशभक्त" सही?

नागरिक हूँ, गुलाम नहीं,

मेरे भी कुछ अरमान सही।


अगर सवाल देशद्रोह हैं,

तो हाँ, मैं देशद्रोही हूँ।

पर मेरा देश मेरी माँ है,

उससे प्यार भी बेहिसाब है।


ये मेरा ही देश है, मेरा ही वतन,

मैं बोलूँगा जब तक है ये तन।

क्योंकि असली वफ़ा है वही,

जो सच में हो, न डर से बही।


© रविंद्र मुण्डेतिया 

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