बचपन की राख में ख़्वाब

 

( रविंद्र मुण्डेतिया द्वारा छवि, देवनार डंपिंग ग्राउंड से, मुंबई ) 


टूटे मकानों में सपने पलते हैं

धूल में भी मुस्कुराते चलते हैं।


नंगे पाँव हैं, मगर दिल अमीर है

रोटियों से बड़े अरमान जलते हैं।


माँ के आँचल में भूख सिमटती है

बाप की आँखों में मौसम बदलते हैं।


स्कूल की राह पे काँटे बिछे हुए

फिर भी कलम के ख्वाब मचलते हैं।


सत्ता के कान बहरे हैं आज भी

इनकी चीखें कहाँ सुनते हैं।


छोटे हाथों में मज़दूरी की रेखा

काग़ज़ों पे हक़ के किस्से ढलते हैं।


कोई तो पूछे इन गलियों से कभी

क्यों इन बच्चों के सपने टलते हैं।


© रविंद्र मुण्डेतिया 

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